आदिनाथ भगवान ने कृषि करो या ऋषि बनों का सूत्र दिया –भूतबलि सागर जी महाराज

रिपोर्ट राजीव गुप्ता आष्टा जिला सीहोर मध्य प्रदेश

धर्म नहीं अर्थ,काम मिटाएं — मुनि सागर महाराज

आष्टा।भगवान आदिनाथ जी जैन संस्कृति के प्रथम तीर्थंकर हैं ।जिन्होंने आज से करोड़ों वर्ष पूर्व पिता नाभिराय एवं माता मरु देवी के पुत्र के रूप में अयोध्या नगरी में जन्म लिया था ।लाखों वर्षों तक राज्य कर प्रजा को षटकर्म असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, विद्या और शिल्प करने की शिक्षा देते हुए कृषि करो या ऋषि वनों का सूत्र दिया था। राज वैभव भोगने के बाद वैराग्य धारण कर मुनि बनकर तपस्या करते हुए आज ही के दिन माघ कृष्ण चतुर्दशी को उन्होंने कैलाश पर्वत अष्टापद से मोक्ष प्राप्त किया था।मन बंदर के समान है,इधर से उधर कूदता है।मन पर अंकुश लगाने का आव्हान किया। आदिनाथ भगवान ने काया को सूक्ष्म बना दिया,शरीर को छोड़ दिया। भगवान मोक्ष गए तो बाल रुपी कचरा और नाखून गिर गया।आप लोग भी बाल रुपी कचरा को हटाएं । मुनि दो से चार माह में केशलोच करते हैं। उक्त बातें मुनिश्री भूतबलि सागर महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर आदिनाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक महोत्सव के अवसर पर आशीष वचन देते हुए कहीं। आपने कहा महान पुण्य का समय आया है,जो आपका कल्याण करेगा।एक पुण्य संसार में रखता है और एक पुण्य सिद्ध शिला पर ले जाता है।हम भी पूज्य बने,यह भाव भाकर आराधना करें। आदिनाथ भगवान ने दोष नहीं लगने दिया।दोष दूर करने का प्रयास करें। कर्मों की जड़ को दूर करें। कर्मों को जीतने की ताकत पूछने पर मिलती है। आदिनाथ भगवान से सारे वैभव को त्याग कर आत्म कल्याण में लीन हो गए। आर्यिका बनने के बाद महिला भी केशलोच करती हैं।भूले भटके को राह दिखाने की बात करते हो, लेकिन आते नहीं। धर्म समझकर आत्म कल्याण करें।पाप से बचना नहीं जानते,पाप में लीन हैं।घर में शुद्ध भोजन करें। प्रतिमा लेने का अभ्यास करें।मुनि सागर महाराज ने आगे कहा दिन भी पावन हो गया। प्रभु ने अपने मोक्ष को प्राप्त किया।500 कल्याणक कर मोक्ष प्राप्त किया। हमें भी उन जैसा बनना है। आदिनाथ जी असंसारी बन गए। निर्वाण कल्याणक अदृश्य है और यह गमन का कल्याणक है।पांच कल्याणक में मुख्य मोक्ष कल्याणक है। आदिनाथ भगवान ने अपना लक्ष्य प्राप्त किया।यह मोक्ष कल्याणक बहुत महत्वपूर्ण है।भाव ही भव के कारण बनते हैं।हाड़ तोड़ने वाले बहुत हाड़ जोड़ने वाले बहुत कम है। विशेष संवेग निर्जरा का माध्यम है। कर्म जो लिपटे हुए हैं,वह छूटेगा। भक्तों का नहीं भगवान का ध्यान रखना चाहिए। धर्म नहीं अर्थ ,काम निपटाएं। अपने नहीं भगवान के कल्याणक मनाएं।अपना बड़प्पन नहीं करें। भगवान का गुणगान करें। पाप कर्म बहुत बजनदार होते हैं, पुण्य कर्म बहुत ही हल्का होते है। पुण्य छप्पड़ फाड़ कर देता है और पाप थप्पड़ मारकर देता है। सिद्धों से शिक्षा ले, सभी को साथ लेकर चलें। अपने पूर्वजों व अपनी पीढ़ी को देखें। सम्यकदृष्टि बने। धर्म करने से सबकुछ होगा। धर्म पुरुषार्थ करें। आदिनाथ भगवान का पूरा परिवार मोक्ष गया। रास्ता दिखाने वाले मिल गए हैं।इस अवसर पर हाटपिपल्या, देवास, खातेगांव के काफी संख्या में श्रावक -श्राविकाएं मुनिश्री के आशीष लेने पहुंचे।

Leave a Comment