आष्टा से राजीव गुप्ता की रिपोर्ट

आष्टा– उक्त उद्गार नगर में विराजित दिगम्बर जैन पूज्य मुनि श्री मुनि सागर जी महाराज ने दस लक्षण पर्व आराधना के अवसर पर उत्तम शौच धर्म के दिन दिव्योदय जैन मंदिर किला पर व्यक्त किये,उन्होंने बताया कि उत्तम शौच धर्म की आप लोगो ने आज आराधना की है,आप सभी लोगो की हार्दिक भावना थी सामान्य को वीशेष में लाने कीभवाना ओर प्रभावना में बहुत अंतर है भावना हम तक रहती है प्रभावना सभी तक पहुचती है,जन जन तक जाने को ही प्रभावना कहते है,

आज चौथा दिन उत्तम शौच धर्म का दिन है,स्वस्छता का भाव ही शौच है,आत्मा के प्रत्येक प्रदेश भी साफ रहे यही इस धर्म का आशय है,आत्मा के प्रत्येक प्रदेश को कर्म रूपी मल से साफ करेंगे उसे ही सच्चे पर्व की आरधना माना गया है,जो कषाय नवे गुणस्थान,क्रोध तभी आता है ,जब मान कि पुस्टि नही होती है,लोभ प्रकट होती है

बड़े से लेकर बूढ़े तक सभी को अनंतानुबंधी लोभ के कारण शांति नही मिल रही है,इससे दूर रहने का प्रयास करो उसमे रमो नही उसका हर्ष नही मनाओ,लोभ तृष्णा सब नीचे ले जाने के साधन है,ग्रहस्था आश्रम में रह कर भी अपना कल्याण कर सकते है,अतिक्रमण होता है तो आक्रमण होता ही है बाद में आक्रमण होता है,फिर प्रतिक्रमण करना होता है,पाप का परिहार नही हुआ, परिग्रही तो रहे लोभी न रहे,जिनकी पगार पांच हजार भी नही है वे कार में घूम रहे है,ये सब लोभ के कारण हो रहा है,

शारीरिक स्वचछता फिर मानसिक स्वक्षता आती है,शौच धर्म अगर प्राप्त करते हो तो शरीर को स्वक्छ करे बिना प्राप्त नही कर सकते,मिथ्यात्व का विपरीत सम्यकत्व है,लोभ के बशीभूत होकर कौरवों की ऐसी मति हो गई थी,अद्भुत है महापुरुषो का जीवन, आजकल वर्तमान में कंचन कामिनी ओर लोभ के कारण ही अप्रत्याशित घटनाएं हो रही है,मेघ को देखकर मयूर नाच उठता है,शोच धर्म को कोई भी अपना नही रहे है,उसी का परिणाम है कि मन में संतोष धन नही आ रहा है किसी को भी,मुनि श्री भूतबलि सागर जी महाराज ने बताया कि,क्रोध छोड़ दिया, मान भी छोड़ा दिया, माया भी छोड़ दिया, लोभ को छोड़ना होगा ये आत्मा का अहित करने वाला है,तीर्थंकर चक्रव्रती आदि सभी ने अपने वैभव को त्यागकर लोभ को त्याग कर अपना जीवन सफल बनाया है,

इस लोभ की वजह से चार गति में संसार मे चौरासी के चक्र में घुमना पड़ता है तीर्थंकर भगवन्तों ने गुरु का उपदेश सुन कर करोड़ो करोड़ का धन वैभव छोड़कर आत्मा के स्वरुप को समझ कर लोभ से दूर हुए है,ओर अपना मार्ग प्रशश्त किया है,कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता हैबड़ी मुश्किल से यह मानव जन्म मिला है इसे अवसर को आखिरी माने ,मनुष्य पर्याय के 48 भव होते है,16 पुरुष पर्याय,16 स्त्री पर्याय,16 नपुंसक् पर्याय, लोभ का त्याग नही किया तो आयु समाप्त होने के बाद नरक में ही जाना पड़ेगा,शरीर से ममत्व छोड़कर आत्मा में रम जाना ही भेदज्ञान होता है, बच्चे की आठ साल की उम्र होने के बाद गुरु के पास जाकर संस्कार करना पड़ता है,मधु मांस आठ मद पांच उडम्बर फल आदि का त्याग कर पूज्य बनने का परिश्रम करना चाहिए, सूर्य अस्त होने के बाद चारो प्रकार के आहार स्वाद्य,खाद्य,लेय, पेय का त्याग करना चाहिए वही रात्रि भोजन त्यागी होता है,जितना बनता है उतना त्याग तप करना चाहिए करने वाले कि अनुमोदना करना चाहिए


