अष्टांहिका महापर्व का आगम में विशेष महत्व है –मुनिश्री निष्काम सागर महाराज। चंद्र प्रभ मंदिर समिति ने आचार्य विद्यासागर ज्ञान संस्कार भवन निर्माण हेतु सहयोग राशि सौंपी

रिपोर्ट राजीव गुप्ता आष्टा जिला सीहोर एमपी

आष्टा ।चातुर्मास समाप्ति के पश्चात श्रावकों के लिए यह अष्टांहिका महापर्व प्रारंभ हो गया है। अष्टांहिका महापर्व का अपने आगम में अलग महत्व है।साल में तीन पर्व दसलक्षण महापर्व,सोलाहकारण और अष्टांहिका महापर्व जैन समाज मनाते हैं।

मैना सुंदरी के पति राजा श्रीपाल को कोढ़ी रोग था।मैना सुंदरी के पिता ने द्वेषता के कारण उक्त कोढ़ी से अपनी बेटी का विवाह कराया था। विपरीत परिस्थितियों में मैना सुंदरी ने अपने पति की सेवा की।एक मुनि राज से पूछा की में अपने पति को इस कुष्ठ रोग से कैसे मुक्त करा सकती हूं। मुनिराज ने अष्टांहिका महापर्व पर श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान भक्ति भाव से कराने को कहा। उसने आठ दिनों तक का उपवास कर भगवान की भक्ति कर श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान कराया और दान भी अच्छे भावों के साथ दिया। उक्त विधान का समापन होते ही राजा श्रीपाल का कोढ़ पूरी तरह से समाप्त हो गया।यह अष्टांहिका शाश्वत महापर्व को मैना सुंदरी ने ही पूरे देश में प्रारंभ कराया। उक्त बातें नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर चातुर्मास हेतु विराजित पूज्य गुरुदेव मुनिश्री निष्काम सागर महाराज ने आशीष वचन देते हुए कहीं। मुनिश्री ने कहा भगवान की भक्ति,गुरु और जिनवाणी की वैय्यावृति करने से बहुत पुण्य मिलता है।

भगवान की भक्ति नहीं करने से दूरियां बढ़ती है। सामूहिक धर्म आराधना का अलग पुण्य अर्जन होता है,अकेले धर्म आराधना करने का अलग पुण्य मिलता है। साधु -संतों ने तो पापों को गलाने के लिए त्याग -तपस्या का मार्ग चुना और आप लोग पापों को बढ़ाने में लगे हुए हैं। मुनिश्री निष्काम सागर महाराज ने कहा व्यक्ति अकेला आया था और अकेला ही उसे जाना है।वह इस संसार में अटका और भटका हुआ है। जिनको अपना मानते हैं वह ही आपका साथ नहीं देते।गुरुदेव संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज कहते थे कि बोलों तो हित मित प्रिय वचन बोले, अन्यथा मौन रहे।आपके वचन आपके आदर्श है।एक शब्द वाण का काम करते हैं और एक शब्द मलहम का काम करते हैं। महापुरुष महापुरुष होते हैं।

ज्ञान- ध्यान में लीन रहो।आत्मा की आराधना करों।कर्ण प्रिय बोले, घातक नहीं बोलें। मुनिश्री ने कहा थोड़ा मायाचारी से ऊपर उठकर पुरुषार्थ करें। खंडित हो गया महल फिर भी मरम्मत करते हैं।बाल सफेद हो गए हैं, उन्हें आप काले कर रहे हैं। आचार्य भगवंत ने मूकमाटी में लिखा है पाप से घृणा करों पापी से नहीं।जो कल तक हैरान और परेशान था वह सदा संगति अच्छी रखेंगे तो भाव व परिणाम अच्छे मिलेंगे।हम साधक व संत नहीं बने तो कम से कम अच्छे व्यक्ति तो बने।

विपरितता में अवसर नहीं छोड़े। जिंदगी की राहों में अक्सर ऐसा होता है, फैसला जो मुश्किल होता है वहीं होता है। निर्माण कार्य पाठशाला का होगा शास्त्री कॉलोनी में समाज द्वारा बनवाई गई आचार्य विद्यासागर ज्ञान पाठशाला संस्कार भवन में कुछ निर्माण कार्य होना है। जिसमें समाज द्वारा सहयोग किया जा रहा है। श्री चंद्रप्रभु मंदिर समिति गंज की श्रीमती श्रद्धा गंगवाल, श्रीमती खुशी कासलीवाल, श्रीमती अंजू जैन, श्रीमती सुनीता अष्टपगा,श्रीमती ममता जैन, श्रीमती आभा जैन ने पांच हजार रुपए की सहयोग राशि समाज के महामंत्री कैलाशचंद जैन को सौंपी।

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