बच्चे के गर्भ में आने के बाद गुस्सा नहीं करें –भूतबलि सागर ‌। आदिनाथ प्रभु को मानते हैं लेकिन उनकी बातों को नहीं मानते — मुनि सागर महाराज

रिपोर्ट राजीव गुप्ता आष्टा जिला सीहोर मध्य प्रदेश

‌आष्टा।आदिनाथ प्रभु को मानते हैं ,लेकिन उनकी बातों को नहीं मानते, जैन भिखारी नहीं होते। कृषि करों यह ऋषि बनों। मुनि बनने की भावना भाएं।घर गृहस्थी में रहकर प्रतिमा लेकर समाधि मरण का लक्ष्य रखें। मां के गर्भ में भगवान के आते ही माता की बुद्धि बहुत तेज हो जाती है। जीवित रहने के लिए षट कर्म बताएं। देशी गाय का दूध स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।उस पर हाथ फेरने से रोग दूर होते हैं।आज गाय को छोड़कर कुत्ते को पाल रहे हैं और उस पर हाथ फेर रहें हैं। आदि प्रभु द्वारा बताई गई बातों को भूल गए हो। उक्त बातें नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर मुनि भूतबलि सागर महाराज एवं मुनि सागर महाराज ने आशीष वचन देते हुए कहीं। मुनिश्री ने आगे कहा कि आदि कुमार मोह, ममता छोड़कर आत्म कल्याण के लिए निकल गए। सम्यकदृष्टि थे इसलिए सम्यकवान थे। पहले भी साधन थे और आज भी है आराधना करने के। घर- घर में गाय होना चाहिए।हर व्यक्ति को खेती करना चाहिए। पहले साधना करने का ज्ञान नहीं था। आदि कुमार ने नोकरी करने व व्यापार करने का नहीं बल्कि कृषि करने को कहा था। कृषि करना पाप नहीं। भूतबलि सागर महाराज ने कहा गुस्सा आता है तो णमोकार मंत्र का जाप करें। बच्चा गुणवान आएगा। आदिनाथ भगवान का स्वयंभू स्तोत्र पढ़ने से जागृत अवस्था आएगी,वह तीन ज्ञान धारी थे। वर्ण चार ही रहेंगे, धर्म एक ही है। वर्ण अवस्था बदल सकती है।

असी,मसी, कृषि करने के लिए आदि कुमार ने कहा।भोग भूमि में भोगने वाले रह गए।जिन अर्थात जिनेंद्र के अनुयाई बन गए। चांद की महिमा है वह सभी को लेकर आता है। बहुत बड़ा परिवार था आदिनाथ भगवान का लेकिन मोह नहीं था। आदि कुमार इंद्रियों व पत्नी के गुलाम नहीं थे। उनके साथ हजारों लोगों ने दीक्षा ली। उन्हें भोजन से मोह नहीं था। आदिनाथ भगवान सभी का कल्याण चाहते थे, सिर्फ स्वयं का नहीं घर में शांति से रहो,सात प्रतिमा तक घर में रहकर व्यापार कर सकते हो।जो करेगा वो भरेगा, सेवा करोगे मेवा मिलेगा। सहनशीलता रखें। विकृति वालों को संस्कृति का पालन करना चाहिए। संयास आश्रम में खाली होकर आना पड़ता है। दुनिया अंधी नहीं है।जीव रक्षा , अहिंसा धर्म का नारा लगाए। देखा-देखी नहीं करें,सोच समझकर कार्य करें।

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