जैनी लोग भीख नहीं मुक्ति का मार्ग मांगते हैं — भूतबलि सागर महाराज

आष्टा जिला सीहोर मध्य प्रदेश से राजीव गुप्ता की रिपोर्ट

धन की तृष्णा नहीं मिट रही है, पेट नहीं पेटी भर रहे हैं लोग– मुनि सागर महाराज

आष्टा।जैन लोग भीख नहीं मांगते,वे तो मुक्ति का मार्ग मांगते हैं। पंचम काल में जन्मे हैं, जैन हो जैनी बनकर रहे। भगवान और धर्म का स्वरूप समझें। धन व्यक्ति की तृष्णा को बढ़ाने वाला है।मन की तृष्णा मिट नहीं रही है।पेट नहीं भरा रहा,पेटी भरा रही है लोगों की। दुनिया की दौलत मिलने पर भी धन की भूख शांत नहीं।यह कर्म और भोग भूमि है। कर्म भूमि की महिमा है।वासना से उपासना की मूर्ति बना सकते हैं। पत्नी से बहन बना सकते हैं, लेकिन बहन को पत्नी नहीं बना सकते हैं।

उक्त बातें नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर मुनि भूतबलि सागर महाराज एवं मुनि सागर महाराज ने आशीष वचन देते हुए कहीं। आपने भोगों से ऊपर उठकर धर्म आराधना करने की बात कही। संयमी हो तो संयम में वृद्धि करें। तृष्णा रुपी रोग लोगों को लगा है। धन रुपी तृष्णा रोग सभी को है। नोटों से अंत्येष्टि कर दे फिर भी धन की तृष्णा समाप्त नहीं हो रही। संभवनाथ भगवान ने दुख का निवारण बताया है। मुनि सागर महाराज ने कहा कि अच्छे काम को कल पर न छोड़ें, वैराग्य के बिना कल्याण नहीं होगा। तृष्णा घटाने की टेबलेट नहीं है। तृष्णा छोड़ने पर संतोष मिलता है। अस्सी साल की आयु के बाद भी घर व मोह नहीं छूट रहा। हमारे देश में भीख मांगने की आवश्यकता नहीं, लेकिन मंदिर में जाकर भी भीख मांग रहे हैं। इंद्रियों को भोगने में लगे हैं,भोग आपको भोग रहा है। बुढापा नहीं आएगा, पिता के कंधे पर पुत्र की अर्थी उठ रही है। त्याग और संयम से तृष्णा पर नियंत्रण कर सकते हैं। सम्यकत्व का आनंद पड़ोसी से नहीं स्वयं से।जैन शासन और जैन दर्शन में सार है।मोक्ष के लिए रत्नात्रय अपनाना होगा।शुभ आश्रव के लिए पुण्य क्षेत्र में आना होगा।अशुभ आश्रव के लिए पाप क्षेत्र में जाना होगा।

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