रिपोर्ट राजीव गुप्ता आष्टा जिला सीहोर एमपी

आष्टा।प्रेम से रहने का नाम साधुवाद है। सभी के हित मित की बात करें।पल -पल में बदलाव होता है और पल -पल में पाप हो रहा है । समुद्र कभी भी अपना स्वभाव नहीं बदलता है।सास – बहू मिलकर चले, तभी घर स्वर्ग बनें।हम विमलनाथ भगवान को मानते हैं, लेकिन उनके द्वारा कही बातों को नहीं मानते हैं। मनुष्य की पर्याय बदलती रहती है। वह देव भी बन सकता है। जैन दर्शन के अनुसार काम करने से मुनियों का कल्याण होगा। जैन वहीं है जो किसी से न लड़ें।जैन दर्शन को नहीं समझने के कारण बाहर तो दूर मंदिर में झगड़ रहे हैं। कषाय पहले छोड़े। कोई गाली भी बोले तो आप मुस्कुरा कर कुछ नहीं कहेंगे तो उसकी कषाय मन से निकल जाएगी। व्यक्ति को सरल बनना चाहिए,मन में झूठे व गलत विचार आते हैं तो कल्याण नहीं होगा।

उक्त बातें नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर विराजित पूज्य गुरुदेव मुनि भूतबलि सागर महाराज एवं मुनि सागर महाराज ने कहीं । आपने कहा साधुवाद ओर सत्य को जानकर जीवन में अमल कर लिया, वहीं जैन बनते हैं। हमें कभी भी लड़ना नहीं चाहिए।हम एक-दूसरे के पूरक बनें।आपस में समझें।वस्तु स्वरुप का ज्ञान है तो, क्रोध नहीं आएगा। जज की बात को वकील को सुनना पड़ेगी और वकील की बात अर्थात पक्ष को जज को सुनना पड़ेगा।जज के निर्णय को मानना होगा। मनुष्य बनकर नहीं सुधर रहे, मारीच का जीव सिंह पर्याय में आकर अपना कल्याण कर महावीर बने।हठवाद आने पर घर में शांति नहीं रहेगी। तत्वों को समझें और जिंदगी में शांति कैसे हो इस पर ध्यान देना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य में विशेषता होती है। विशेष गुण वाले को देवता कहते हैं।दीपक स्वयं भी प्रकाशित रहता है और को भी प्रकाशित करता है। हमारे पास ज्ञान है वह स्व का नहीं पर के लिए होना चाहिए। परिणाम को निर्मल बनाना चाहिए,पति पतन होता है, इसीलिए पति परमेश्वर है।सुभभावना रखना चाहते हैं तो सम्यकत्व ग्रहण करें।


