नगर के श्री दिगंबर जैन मंदिर मैं चल रहे महाराज श्री के चातुरमास के अवसर पर दिव्य प्रवचन
समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर एवं मुनि भूतबली सागर महाराज का किया गुणानुवाद

गुरु गुणगान भजनों के साथ मनाया गुरुपूर्णिमा पर्वआज मनाया जाएगा वीर शासन जयंती महापर्व

आष्टा— गुरुपूर्णिमा महा पर्व की पावन बैला आई और हरियाली खुशहाली छाई पूर्णिमा के इस महा पर्व को श्रद्धालुओ ने बड़े ही भक्ति भाव के साथ मनाया गुरुओ के उपकार याद कर उनका गुणगान किया गया इस अवसर पर मुनि श्री निष्पन्द सागर जी महाराज ने अपने उदभोदन मे कहा कि एक दूज का चाँद बनता है एक पुर्णिमा का चाँद बनता है दोनो चाँद की अपनी अपनी महत्ता होती है भगवान बनने के लिए भक्त बनना आवश्यक होता है गुरु बनने के लिए शिष्य बनना आवश्यक है गुरु तब ही बन सकते है जब एक अच्छे शिष्य बने हो अच्छा शिष्य ही एक अच्छा गुरु बन सकता है ज्ञान से ही अच्छा आचरण हो सकता है,

आषाढ़ शुक्ल की पूर्णिमा का एक बहुत बड़ा महत्व है आज के दिन भगवान महावीर स्वामी के लिए एक अच्छे शिष्य की प्राप्ति हुई थी 66 दिनों तक तीर्थंकर भगवान की दिव्यध्वनि नही खीरी उसके बाद से ही गुरु शिष्य की परंपरा बन पड़ी शिष्य बनने में ही जीवन का सार है महत्व है एक गुरु को आज के दिन एक शिष्य की प्राप्ति हुई थीजब भी जीवन मे कोई कष्ट आये तो गुरु को याद कर लेना भगवान की दृष्टि सभी के लिए एक सी होती है जीवन मे एक गुरु जरूर बनाना जैन दर्शन में चमत्कार नही अतिशय होते हैगुरु को सच्चे दिल से जो याद किया करता है उसके संकट गुरु जरूर दूर करते है।

गुरु से बड़ा कोई नहीं है वीतरागी दिगम्बर मुनिराज ही गुरु होते है जिसके जीवन मे अहंकार होता है वह गुरु को प्राप्त नही कर सकता भगवान महावीर स्वामी की प्रथम दिव्यदेशना वीर शासन जयंती के दिन 66 दिनों के बाद खीरी थी हमारे गुरु आचार्य विद्यासागर महाराज जैनों के सन्त नही जन जन के संत थे सच्चे गुरु की प्राप्ति से जीवन मे मंगल ही मंगल होता है गुरु को स्वीकार कर अपने जीवन को धन्य करेंगे जीवन के उपकारी रहेंगेमुनि श्री निष्पक्ष सागर जी महाराज ने कहा कि तीन लोक नव खंड में गुरु से बड़ा कोई नही होता गुरु की महिमा अपार होती है जिसका बखान करना आसान काम नही कुछ शास्वत पर्व होते है गुरु आज हमारे बीच प्रयत्क्ष रूप से नही हमे परोक्ष रूप से उनका आशीष जरूर मिल रहा है ,कुछ नैमित्तिक पर्व होते है आज का पावन पर्व नैमित्तिक पर्व है वर्तमान शासन नायक भगवान महावीर स्वामी केवलज्ञान रूपी ज्योति को प्रकट किया परिणामो में निर्मलता प्राप्त कर ज्ञान को प्राप्त किया था बारह वर्षों तक मोन रहकर केवल

ज्ञान का बाद सौधर्म इंद्र में द्वारा ही समवशरण की रचना कर दिव्यदेशना प्रकट होती हैयह वह पावन भूमि है जिस पर महान महान आत्माओं ने जन्म लेकर अपना कल्याण किया है भगवान महावीर स्वामी के शिष्यों में इंद्रभूति अग्निभूति वायुभूति का नाम आता है यह मार्ग महावीर का मार्ग है आदिनाथ का मार्ग है यह दिगम्बर मुद्रा ही भगवान महावीर की मुद्रा है प्रभु की आराधना करना वीतरागता की आराधना करनागुरु की नजर भी भाग्यशाली के ऊपर ही उठती है आज हम ऊपर बैठे है तो सिर्फ गुरु विद्यासागर जी के कारण बैठे है आपकी अंतरंग आत्मा में लोभ होने पर सही दिशा नही मिलती सही लाभ नही मिलता अपनी भावनाओं में निर्मलता लाओ जिस दिन शिष्य की दशा और दिशा बदल जाये उस दिन वीतरागता की महिमा गुरु की महिमा को जाने आपके अंदर भी वीतरागता के संस्कार आये ऐसा कार्य करे गौतम गणधर ने भी भगवान महावीर के शिष्य बनने का सौभाग्य प्राप्त आज ही के दिन किया था वे नही आते तो कोन हमें जीनवाणी का मार्ग बताते उन्होंने एक सच्चे शिष्यत्व होने का स्थान प्राप्त किया था युग को दिशा देने वाले आचार्य परमेष्टि जहाँ कही भी होगी भव्य आत्मा के रूप में होगी।

मालवा का मुख्य द्वार है आष्टा धर्म रूपी गाड़ी का जंक्शन है आष्टा।

