रिपोर्ट राजीव गुप्ता आष्टा जिला सीहोर एमपी

आष्टा।संसार में हर व्यक्ति अपना कल्याण चाहता हैं।हर व्यक्ति सुखी, शांति पूर्वक रहना चाहता है, कोई भी दुःख नहीं चाहता है।गुरु और जिनेंद्र भगवान को तो मानते हैं लेकिन उनकी बातों को नहीं मानते हैं।धन भी सभी कमाना चाहते हैं, लेकिन कोई भी धन गंवाना नहीं चाहता है।हर व्यक्ति सुखी रहने का मंत्र जानते हैं फिर भी महाराज से सुखी होने का मंत्र पूछने के लिए आते हैं। दुनिया में कितने लोग हैं जो संसार से मुक्ति नहीं चाहते हैं। परमात्मा को सभी पाना चाहते हैं।

95 प्रतिशत लोग भगवान की तरह अपना भी कल्याण चाहते हैं।99 प्रतिशत लोग संसार से मुक्ति चाहते हैं। गृहस्थ धर्म के आचरण को अपनाएं, गृहस्थ जीवन में रह रहे हो।देव पूजा, गुरु पूजा, धर्म – आराधना,दान पुण्य करना यह श्रावक के परम कर्तव्य है। उक्त बातें नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर चातुर्मास हेतु विराजित पूज्य गुरुदेव मुनिश्री निष्कंप सागर महाराज ने आशीष वचन देते हुए कहीं। आपने कहा कि व्यक्ति बहुत ही स्वार्थी हैं। स्वयं के लाभ हेतु समय निकाल लेते हैं लेकिन भगवान की आराधना व गुरु सेवा के लिए समय नहीं।

नित्य ही सूर्योदय के पहले उठकर सूरज की लालिमा को देखें। आचार्य भगवंत विद्यासागर महाराज भी सूरज की लालिमा देखते थे। आचार्य भगवंत कहते थे कि सूरज की लालिमा देखने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। मुनिश्री निष्कंप सागर महाराज ने कहा हनुमान जी ने लंका को पहले नहीं जलाया, राक्षसों को सोते हुए में उठाया था। जिनेंद्र भगवान का भक्त ब्रह्म मुहूर्त में उठते हैं।सुबह का मन शांत, खुशी का रहता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले देवता तुल्य है और जो सूर्योदय के बाद उठते हैं वह राक्षस के समान है।गरीब व्यक्ति चैन की निंदा सोते हैं ।चैन की निंद भारत में आती हैं।आज पूरा भारत लंका के समान है। रावण तो असंख्यात है लेकिन राम एक है।हमारी सारी संस्कृति और संस्कार समाप्त हो चुकें हैं।

पहले व्यवस्थाएं अच्छी थी।हर रविवार को पूरे देश में महाभारत देखते थे, सभी एक साथ। बंटवारा हुए, पहले घर -घर में टीवी थी, अब कमरे- कमरे में टीवी हो गई। मोबाइल सोत के समान है। पति-पत्नी अलग -अलग एक कमरे में मोबाइल चलाते हैं।आज विचित्र स्थिति हो गई। सोशल मीडिया का सदुपयोग करें, दुरुपयोग नहीं।परिवार व समाज में एकता रहना चाहिए। समाज में एकता- अखंडता रहना चाहिए। मुनिश्री ने कहा समाज में दूरियां न हो,एक हो।व्यक्तिगत नहीं सामाजिक पूजा-अर्चना का महत्व है। भावना भवनाशिनी होती है। साधु से श्रावक जुड़ता है तो धर्म आराधना होती है। साधु को नहीं बांधें, स्वयं साधु से जुड़े।पूज्य मुनि श्री निष्कंप सागर जी महाराज ने कहा संसार मे किसी व्यक्ति से पूछा जाए तो हर व्यक्ति कहेगा मुझे अपना कल्याण करना चाहता हूं, हर व्यक्ति चाहता है मेरे जीवन मे दुख न आये अनादि काल से सुख की खोज में घूम रही है ,पर आज तक सुख मिला नही धन कमाना ।दुनिया में ऐसे कितने लोग है जो संसार में रहना चाहते है, अधिकांश लोग संसार से मुक्त होना चाहते है।हम जिनेंद्र भगवान के अनुयाई है पर हमारा आचरण उनके जैसा नही है। जो व्यक्ति श्रावक जैसे आचरण नही करता है उन्हें श्रावक कहलाने का अधिकार नही है।जब तक आप उसके योग्य आचरण नही करोंगे तब तक सच्चे श्रावक कहलाने के योग्य नही ।अभी हम धर्म को समझ नही सके है ,जिस दिन हमने सूरज उदय होने के पहले हम नही जागते उस दिन हमारा दिन का पूरा चक्र बिगड़ जाता है ।जिनेंद्र भगवान का भक्त ब्रम्ह मुहूर्त में उठता है ,सुबह का मन शांत होता है ।सूर्योदय के बाद तक सोना नही चाहिए।

