रिपोर्ट राजीव गुप्ता आष्टा जिला सीहोर एमपी

आष्टा । श्री चंद्र प्रभु दिगंबर जैन मंदिर अरिहंत पुरम अलीपुर में चातुर्मास हेतु विराजमान मुनिश्री प्रवर सागर मुनिराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जिनेंद्र भगवान की वाणी आत्मा के गुणों को प्रकट करने वाली है। जिस प्रकार सूरज के उदय होने से प्रकाश चारों ओर फैल जाता है, ठीक उसी प्रकार जिनवाणी जब हृदय में जाती है तो आत्मा में धर्म आना प्रारंभ होने लगता है।धर्म का महत्व बताते हुए कहा कि धोती और दुपट्टा पहनना धर्म है ,मुट्ठी भर घर से चावल ले जाना धर्म है, प्रभु के दर्शन करना धर्म है, अर्थात धर्म की सही परिभाषा को जानें तो सच्चा धर्म वही है जिसे हम हृदय में धारण करके आत्मीय सुख का अनुभव कर सकते हैं। धर्म को धारण करने वाला धर्मात्मा होता है। एक उदाहरण के माध्यम से मुनिश्री ने समझाया कि एक दिगंबर संत तपस्या में लीन थे तभी एक स्त्री की दृष्टि उन मुनिराज पर पढ़ती है और उसके मन में भाव आता है कि ये तो दरिद्र है इनके पास तन को ढकने के लिए वस्त्र भी नहीं है,बड़े मुनि- राज के बड़े भक्त और छोटे मुनिराज के छोटे भक्त।अतः पंचमकाल में लोग दिगंबर संत को दरिद्र समझते है। सुखी रहें सब जीव जगत के कोई कभी न घबराएं, बैर पाप अभिमान छोड़ जग नित्य नए मंगल गावे। अर्थात श्रावक को निरंतर यही भावना भानी चाहिए कि संसार में रहने वाले प्रत्येक जीव सुखी रहे, उसे कोई कष्ट न हो, कषाय और पाप कार्यों को छोड़कर नित्य प्रति सुबह से धार्मिक पाठ णमोकार महामंत्र , नए -नए धार्मिक मंगल गीतों का गान करना चाहिए। जिससे संसारी जीव धार्मिक क्रिया में मग्न होकर अपनी आत्मा का कल्याण कर सकता है।

णमोकार महामंत्र बोलने से कई कर्मों की निर्जरा होगी।,धर्म का रथ श्रावक और संतों से ही आगे बढ़ेगा– मुनिश्री सानंद सागर जी

आष्टा।णमोकार महामंत्र बोलने से कई कर्मों की निर्जरा होगी।जब मंदिर जी मे कोई पूजन कर रहा हो, सामूहिक स्वाध्याय चल रहा हो तो तेज आवाज में घंटी न बजाए ,आवाज के शोर से सभी का ध्यान भटक जाएगा और आपको अंतराय कर्म का बंध होगा इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए ।मंदिर में ऐसा उच्चारण करें जिससे दूसरे को विध्न न हो।ऐसा बोलें की आपको ही सुनाई दे।अज्ञानता वश अहंकार से गलत शब्द नहीं बोले, स्वप्न में भी ऐसा नहीं करें।मन, वचन और काया से क्षमायाचना क्यों करते हैं, किसी बोल से अपनी व दूसरे की दुर्गति न हो।ऐसा सानिध्य प्राप्त करें जिससे अभी और भविष्य अच्छा व्यतीत हो।पाप छोड़ने योग्य है और पुण्य अधिक बढ़ाने के लिए पुण्य छोड़ना नहीं। श्रावक का प्रथम कर्तव्य देव पूजन है।धर्म का रथ श्रावक और संतों से ही आगे बढ़ेगा ।कल का भरोसा नहीं, इसलिए समय पर काम करें। अपनी आत्मा का कल्याण करें। वीतरागता के उपासक हो तो रागी के पास नहीं जाना चाहिए।रागी को भगवान जैसे नहीं मानें। नारकीय और देवों की संतान नहीं होती है, सांसारिक की संतान होती है। वीतरागता को पूजें। उक्त बातें नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर विराजमान आचार्य आर्जव सागर मुनिराज के परम प्रभावक शिष्य मुनिश्री सानंद सागर जी ने आशीष वचन देते हुए कही। आपने कहां गुरु नाम गुरु आचार्य विद्यासागर जी से हमे इतना मिला कि किसी ओर की जरूरत नही।आचार्य श्री आर्जव सागर जी से हमें संस्कार मिले है।कोई भी क्रिया करो ऐसी करो जिससे कि हमसे किसी को किसी प्रकार का कष्ट न हो। मुनिश्री सानंद सागर जी ने कहा भोजन को औषधि बनाए,देव दर्शन इसलिए करते हैं प्रभु आपने जो प्राप्त किया है वह हमें भी प्राप्त हो। हमारी आत्मा नवनीत मक्खन की तरह है। सम्यकदृष्टि और मिथ्या दृष्टि में आपने अंतर समझाया। हम आत्मा के कल्याण की बात बोलते हैं। संसार छोड़ने के लिए पुरुषार्थ करना पड़ता है। कुछ शास्त्र पढ़कर अपने आपको ज्ञानी मानते हो तो गलत है।जो ज्ञान है, उससे अधिक ज्ञान वाले हैं, आज भी अज्ञानता है और ज्ञान प्राप्त करें,ज्ञान के विपासु बनकर आत्म कल्याण करें। अपने विवेक का उपयोग करें।आप लोग वीतरागता के उपासक हो,आप रागी व्यक्ति के पास जा रहें हों, अभी तो वह खुद दुर्गति की ओर बढ़ रहा है तो वह आपका क्या भला करेंगा। जहां कपड़ा वहां लफड़ा। हमने कपड़े नहीं छोड़े जब तक बहुत विकल्प आते थे, कपड़े छोड़ कर संयम के मार्ग पर अग्रसर हुए तब से कोई विकल्प नहीं आया।पुरुषार्थ सही दिशा में करें, मायाचारी करने वाले की दुर्गति ही होती है, मायाचारी नहीं करें,जिस कुल में हो उसके कर्तव्य का पालन करें। मुनिश्री सानंद सागर जी ने कहा घर से मंदिर के भाव रखकर आएंगे तो वहीं से पुण्य अर्जित होने लगेगा। उठकर सबसे पहले नो बार अपने ह्रदय में णमोकार महामंत्र को बसा लो। किसी भी परिस्थिति में हो पंच परमेष्ठि का स्मरण करें। मुनिश्री सानंद सागर जी ने कहा कि अभी तक हमने संसार में क्या किया उसी को लेकर नही उससे आगे का लक्ष्य बनाए ।भूतकाल में आप ने कुछ अच्छा किया होगा जो आज हमें मनुष्य पर्याय और जैन कुल मिल गया। सच्चे देव, शास्त्र ,गुरु की शरण मिल गई ।जिसका वर्तमान उज्जवल होगा उसका भविष्य भी उज्जवल होगा। सबसे पहले देवदर्शन की विधि सीखे, रूढ़िवादी से हमारे पूर्वज जो करते आये वह नही जो समीचीन मार्ग विधि हो उसे समझे जैसा भगवान ने किया वैसा हम करते नही, इस लिए आज तक हमे सुख -शांति नही मिली ।यह जीव अनंत काल से संसार में परिभ्रमण कर रहा है अभी हम परम्परा का निर्वहन कर रहे है ।अपना विवेक नही लगा रहे है ।भगवान पद्मासन मुद्रा लगा कर हाथों पर हाथ रख कर बैठ गए है ।नासा दृष्टि से अपने अंदर के परिणामो को देखकर ही केवल्य ज्ञान प्राप्त कर लेते है ।विपरीत चलेंगे तो मोक्ष मार्ग प्राप्त नही हो सकता। मन वचन काय की एकता से ही मोक्ष मार्ग प्राप्त हो सकता है। भव्य आत्मा कहती है कि जब जागो तब सवेरा, अब जाग जाओ हम जगाने आये है। चतुर्मास हमें जगाने आया है ,नींद से उठ कर धर्म -ध्यान में मन लगाओ, भविष्य उज्जवल होगा।
किला मंदिर पर प्रति दिन प्रातः 8:15 बजे आचार्य श्री की महामांगलिक पूजन, 8:30 बजे मुनि द्वय के मंगल प्रवचन होंगे।

