जैन धर्म भक्त से भगवान बनाने की कला सिखाते हैं — मुनिश्री सानंद सागर जिनेन्द्र भगवान की भक्ति और जिन अभिषेक को सामान्य नहीं समझना — प्रवर सागर मुनिराज

रिपोर्ट राजीव गुप्ता आष्टा जिला सीहोर एमपी

आष्टा।जब तक ज्ञान नहीं तब तक हैय और उपाधी को नहीं समझ सकते हैं। उपाधि आपकी आत्मा का कल्याण करेंगे।आत्मा का कल्याण हो वह काम करें जो आत्मा को दुःख दे उन्हें छोड़ देवें। आचार्य भगवंत समंतभद्र स्वामी ने 19 दोष बताए हैं।लोक व्यवहार भी चलाना पड़ता है।राग ,लोभ, द्वेष ,कषाय सहित वाले कुगुरु होते हैं। केवल जैन धर्म ही भगवान बनने की प्रेरणा और कला सिखाते हैं।पर से उपेक्षा का नाम मोक्ष है और जहां अपेक्षा है ,वहां संसार है।हम गुणों की आराधना करते हैं,नाम की नहीं। नाम से नहीं गुणों की पूजा करते हैं।आजकल कुरीतियां अधिक चल रही है।

सभी भगवान एक समान है, किसी भी भगवान की आराधना करें, लेकिन भक्ति- भाव से करें।दया रहित कुधर्म को नहीं मानें।जैसा कर्म बंधा है वह उदय में आएगा।एक इंद्रिय जीव के प्रति भी दया भाव रखें। कर्म रूपी बैंक है जो जमा करोंगे वहीं मिलेगा।जिनेन्द्र भगवान की भक्ति और जिन अभिषेक को सामान्य नहीं समझना ,हिंसा,राग में लगे हैं वह गुरु नहीं हो सकते हैं।क्रोध अंधा होता है। उक्त बातें नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर चातुर्मास हेतु विराजमान आचार्य आर्जव सागर मुनिराज के परम प्रभावक शिष्य मुनिश्री सानंद सागर मुनिराज एवं श्री चंद्र प्रभु दिगंबर जैन मंदिर अरिहंत पुरम में आचार्य विनिश्चय सागर मुनिराज के परम प्रभावक शिष्य मुनिश्री प्रवर सागर मुनिराज ने आशीष वचन देते हुए कही। मुनिश्री सानंद सागर मुनिराज ने कहां पहले इतने संस्कार थे कि गुरु के चरण स्पर्श शिष्य करते थे। सरस्वती स्कूल में यह परम्परा आज भी चल रही है। गुरु के अंतरंग में कषाय है तो वह सही दिशा नहीं देते हैं। भ्रष्टाचार का जमाना है ,संत्री से मंत्री तक भ्रष्ट हैं। शासन भ्रष्टाचार का कार्यालय खोल देवें। आश्चर्य है इतना भ्रष्टाचार होने के बाद भी देश एक नंबर पर आ रहा है। जहां राग,लोभ, हिंसा है वह पूज्यनीय नहीं है। जहां हिंसा,लोभ,राग -द्वेष हो वहां धर्म नहीं। मुनिश्री ने कहा अच्छाई जहां भी मिले उसे ग्रहण करें,जो बुरा है उसे छोड़ते चलें। बिना ज्ञान के आत्म कल्याण नहीं होगा। आचार्य समंतभद्र स्वामी ने पहले भगवान की परीक्षा ली, उसके बाद नमस्कार किया। जिनवाणी मोक्ष का कारण है। हमें कैसा व्यवहार करना चाहिए यह भी जिनवाणी बताती है। आज आदिनाथ भगवान, आचार्य भगवंतों के चित्र अनावरण दीप प्रज्जवलित कर मुनिश्री सानंद सागर मुनिराज को शास्त्र भेंट करने का लाभ समाज की वरिष्ठ पदमा कासलीवाल, नरेन्द्र गंगवाल, जितेंद्र जैन, मोहित कासलीवाल, महिला जागृति मंच मेन शाखा अध्यक्ष श्रद्धा गंगवाल, प्रीति जैन,महिला जागृति मंच अध्यक्ष खुशी कासलीवाल ने कर मुनिश्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।जैसा द्रव्य चढ़ाओगे वैसा ही फल मिलेगा। आज अरिहंतपुरम आष्टा में चल रहे 24 तीर्थंकर महामंडल विधान में पंचम तीर्थंकर देवाधिदेव 1008 श्री सुमति नाथ भगवान की पूजा, भक्ति और आराधना हुई ,जिसमें मुनिश्री प्रवर सागर जी मुनिराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि अभी जो पुरुषार्थ चल रहा है वह उस छद्मस्थ अवस्था को और केवलज्ञान को प्राप्त करने का है। आज श्रावकों ने भगवान सुमतिनाथ जी की पूजन और भक्ति करके धर्म की गंगा में डुबकी लगाकर केवलज्ञान की ओर बढ़कर प्रशस्त पुण्य का संचय किया। इस जिनेन्द्र भगवान की भक्ति और जिन अभिषेक को सामान्य नहीं समझना है ।इस भक्ति से तीर्थंकर जैसी प्रकृति का बंध करके अपनी आत्मा का कल्याण किया जा सकता है । मुनिश्री प्रवर सागर मुनिराज ने कहां जो अभव्य जीव होता है वह भी भगवान के समवशरण में जाता है लेकिन भगवान के समीप नहीं पहुंच पाता है क्योंकि उस समवशरण में भव्य नाम का कूट होता है और जैसे ही भव्य नाम के कूट के सामने आता और वह जीव अंधा हो जाता है अर्थात उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगता है। क्योंकि जब तक व्यक्ति की सत्ता में पुण्य का उदय नहीं होता तब तक ना तो भगवान की पूजा और ना ही भक्ति कर सकता है। सम्मेद शिखर जी क्षेत्र के बारे में बताते हुए कहा कि बहुत से श्रावक तीर्थ की वंदना के लिए जाते हैं लेकिन सत्ता में पुण्य का उदय ना होने से वह तीर्थ की वंदना थोड़ी ही करके उनकी आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगता है, आचार्यों ने कहा कि जो अभव्य जीव होते और जिनका दीर्घ संसार बढ़ा हुआ वह सिद्ध क्षेत्र की वंदना नहीं कर सकते और जो भव्य जीव होते वही भाव सहित सम्मेद शिखर की वंदना को कर सकते हैं। क्योंकि कहा भी गया है भाव सहित वंदे जो कोई, ताहि नरक पशु गति नहीं होई। एक पंडित जी का उदाहरण देते हुए कहा कि उनका प्रवचन चल रहा था सामने से एक ग्वालन दूध लेके आ रही थी उसने प्रवचन को सुन लिया कि भगवान की भक्ति करने से पुण्य का आश्रव होता और व्यक्ति संसार से पार हो जाता है। यदि श्रावक के जीवन में संयम होता तो वह संसार से पार हो जाता और यदि जीवन में यदि संयम नहीं होता वह श्रावक संसार की नाव में डूबता चला जाता है।

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