रिपोर्ट राजू गुप्ता आष्टा जिला सीहोर मध्य प्रदेश

आष्टा। शुक्रवार 16 फरवरी को मां नर्मदा जयंती के पावन अवसर पर शांति नगर स्थित मां के मंदिर में विशेष श्रृंगार कर पूजा – अर्चना कर हवन किया और महाआरती कर प्रसादी का वितरण किया गया। वहीं भंडारे के कार्यक्रम में काफी संख्या में श्रद्धालुओं ने शामिल होकर प्रसादी ग्रहण की।पौराणिक मान्यता के अनुसार, शिव जी की कठोर तपस्या के परिणामस्वरूप मां नर्मदा की उत्पत्ति हुई. यही वजह है कि मां नर्मदा को शिवजी की पुत्री भी माना जाता है. स्कंद पुराण के अनुसार, राजा हिरण्यतेज ने अपने पितरों को मोक्ष दिलाने के लिए 14 वर्षों तक तपस्या की. जिसमें उन्होंने शिवजी से प्रार्थना की कि नर्मदा को पृथ्वी पर भेजा जाए.

आचार्य पंडित रघुनंदन शर्मा ने मां नर्मदा जयंती पर मां नर्मदा के संबंध में बताया कि शिवजी की आज्ञा से एक 12 वर्ष की कन्या (नर्मदा) मगरमच्छ पर बैठकर मेखलपर्वत (मध्यप्रदेश के अमरकंटक के पास) पर अवतरित हुई ।वहां से नर्मदा गुजरात के भडूच (खंभात की खाड़ी) में विलीन हो गईं।

यही वजह है कि अमरकंटक को मां नर्मदा के सिर का भाग माना जाता है।जबकि भडूच को पैर वाला हिस्सा माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हर वर्ष माघ महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को नर्मदा जयंती मनाई जाती है।मान्यता है कि इसी तिथि पर मां नर्मदा का जन्म हुआ था। नर्मदा जयंती के दिन नर्मदा नदी में स्नान, दीपदान और पूजा-पाठ करने का विशेष महत्व है। स्वर्गीय श्री महेश पराशर जी के निज निवास शांति नगर आष्टा पर स्थित मां नर्मदा मंदिर पर भी प्रातः 7 बजे मां नर्मदा का षोड्षोपचार द्वारा पूजन, अभिषेक ,हवन ,पूर्णाहुति महा आरती आचार्य पंडित रघुनंदन शर्मा द्वारा धार्मिक विधि विधान से सम्पन्न हुई व भंडारे का भी आयोजन हुआ ।जिसमें आसपास के सभी भक्तों ने पहुँच कर धर्म लाभ लिया व प्रसादी ग्रहण की ।

