मुनिश्री निष्पक्ष सागर एवं निष्प्रह सागर महाराज ने किया मंगल विहार, आज शाम जावर पहुंचेंगे।

*तन को नहीं, मन को पवित्र करना चाहिए — मुनिश्री निष्कंप सागर महाराज*

चातुर्मास का समापन पिच्छिका परिवर्तन के साथ हुआ। इस अवसर पर मुनिश्री निष्कंप सागर महाराज ने धर्म के महत्व और पवित्रता के विषय में महत्वपूर्ण उपदेश दिए। उन्होंने कहा कि तन की शुद्धता से अधिक मन की पवित्रता आवश्यक है। उन्होंने श्रावकों से आग्रह किया कि जीवन में धर्म का आराधन निरंतर होना चाहिए।मुनिश्री ने कहा, “सम्मेद शिखरजी की यात्रा के बाद मन शुद्ध नहीं हुआ तो उसका कोई लाभ नहीं। तन कितना भी सजा हो, यदि मन पवित्र नहीं, तो वह शरीर व्यर्थ है।

जैन संतों के पास रत्नत्रय (सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र) होते हैं, जो संसार के रत्नों से अधिक मूल्यवान हैं।”मुनिश्री ने यह भी कहा कि जैन दर्शन में त्याग को प्रधानता दी गई है, भेंट को नहीं। साथ ही, समाज को अपनी युवा पीढ़ी को धर्म से जोड़ने और प्रोत्साहित करने पर भी बल दिया।मुनिश्री निष्पक्ष सागर और निष्प्रह सागर महाराज का मंगल विहारसंत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज के शिष्य मुनिश्री निष्पक्ष सागर और मुनिश्री निष्प्रह सागर महाराज ने सोमवार को चातुर्मास समाप्ति के बाद जावर के लिए मंगल विहार किया। चातुर्मास के दौरान उन्होंने समाज के श्रावकों से हुई किसी भूल के लिए क्षमा मांगी और सभी ने एक-दूसरे को क्षमा कर नई शुरुआत का संदेश दिया।

मुनिश्री ने कहा, “मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए।” बच्चों और युवाओं में धर्म के प्रति बढ़ते लगाव को देखकर उन्होंने समाज की सराहना की।

*बच्चों और वृद्धों की आंखों में भावुकता*

चार माह के सानिध्य के बाद मुनिराजों के विहार का समाचार सुनते ही समाज के बच्चों से लेकर वृद्धों तक की आंखों में आंसू आ गए। समाजजनों ने मुनि संघ की परिक्रमा की और अलीपुर तक उनका साथ दिया।

*जुलूस के रूप में नगर प्रवेश*

मंगलवार, 26 नवंबर को मुनिश्री निष्पक्ष सागर और निष्प्रह सागर महाराज जावर पहुंचेंगे। कृषि उपज मंडी के सामने से जुलूस के रूप में नगर प्रवेश करवाकर धर्मशाला में कार्यक्रम का समापन किया जाएगा। मुनिश्री के आशीर्वचन से समाज लाभान्वित होगा।

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