नगर में पांच दिवसीय होली उत्सव का शुभारंभ, 17 मार्च को आएंगे श्री प्रदीप मिश्रा

नगर में 6 दिवसीय होली का आगाज,परम्परा अनुसार पंचमी तक रोजाना होली चलती है। पंडित प्रदीप मिश्रा के आगमन को लेकर उत्साह का वातावरण

रिपोर्ट राजीव गुप्ता आष्टा जिला सीहोर एमपी

नगर में होली महोत्सव का शुभारंभ हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हो गया है। आष्टा की विशेष परंपरा के अनुसार, रात्रि में महिलाओं द्वारा विधिवत होली पूजन किया जाता है और शुभ ब्रह्म मुहूर्त में होलिका दहन संपन्न होता है।

इसके बाद पुरुष नगर में परिक्रमा करते हुए उन परिवारों तक पहुंचते हैं, जहां वर्षभर में किसी परिजन का निधन हुआ हो। वे ढोल-धमाके के साथ रंग-गुलाल खेलते हैं, जिससे शोक संतप्त परिवारों को सांत्वना और समाज में एकजुटता का संदेश दिया जाता है।

इस अवसर पर पुलिस प्रशासन की व्यवस्थाएं चुस्त-दुरुस्त नजर आईं।नगर की होली की खास बात यह है कि यहां रंग पंचमी तक पूरे पांच दिन तक उत्सव का उल्लास बना रहता है। इस वर्ष होली महोत्सव के दौरान 17 मार्च को प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय कथा वाचक श्री प्रदीप मिश्रा जी भी महादेव की होली मनाने आष्टा पधार रहे हैं।

उनके आगमन से नगर का वातावरण और अधिक भक्तिमय और आध्यात्मिक हो जाएगा।इस आयोजन को लेकर नगरवासियों में जबरदस्त उत्साह है। विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाएं इस पर्व को भव्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

*होली: रंगों और उल्लास का पर्व।*

होली भारत का एक प्रमुख और प्राचीन त्यौहार है, जिसे रंगों का पर्व भी कहा जाता है। यह फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और मुख्य रूप से दो दिनों तक चलता है

पहले दिन होलिका दहन और दूसरे दिन रंगोत्सव (धुलेंडी)। हालाँकि, कुछ स्थानों पर यह उत्सव पाँच से सात दिनों तक चलता है, जैसे कि आष्टा (मध्य प्रदेश) में।

**होली का धार्मिक और पौराणिक महत्व* *

चुस्त दुरुस्त प्रशासनिक एवं पुलिस व्यवस्था

होली का सबसे प्रमुख पौराणिक संदर्भ भक्त प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ा है।हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद: असुरराज हिरण्यकशिपु को अपनी शक्ति पर घमंड था और उसने सभी को अपनी पूजा करने का आदेश दिया। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था।होलिका दहन: हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका (जिसे आग में न जलने का वरदान था) की गोद में प्रह्लाद को बैठाकर अग्नि में प्रवेश करने को कहा। परंतु, भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जलकर भस्म हो गई।

तभी से बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक रूप में होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है।भगवान कृष्ण और होली: एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण और राधा की प्रेम कहानी से भी होली जुड़ी हुई है। श्रीकृष्ण, जो कि सांवले थे, राधा और गोपियों के साथ हंसी-मजाक में रंग खेला करते थे, जिससे ब्रज में फाल्गुनी होली की परंपरा शुरू हुई।डांडिया नृत्य और गोपीनाथ मंदिरों में होली उत्सव खास आकर्षण होते हैं।होली का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व इस दिन दुश्मन भी गले मिलकर मित्र बन जाते हैं।

फाल्गुन ऋतु में आने वाली बीमारियों को दूर करने के लिए रंग खेलना लाभदायक होता है।यह पर्व हमें समाज में एकता और सौहार्द का संदेश देता है। चाहे मथुरा-वृंदावन की फाल्गुनी होली हो, बरसाने की लठमार होली या आष्टा की पांच दिवसीय होली—हर स्थान पर यह अपने अलग-अलग रंगों में नजर आती है।

Leave a Comment