जब तक जीवन में गुरु नहीं, तब तक जीवन शुरू नहीं। कृष्णा मां

गुरु पूर्णिमा अमृत महोत्सव के विराम दिवस पर आध्यात्म, भक्ति और भजन की अविरल धारा बहती रही।

रिपोर्ट राजीव गुप्ता आष्टा जिला सीहोर एमपी

आष्टा ।श्री ब्रह्मानंद जन सेवा संघ, मालीपुरा, आष्टा के पावन तत्वावधान में आयोजित श्री गुरु पूर्णिमा अमृत महोत्सव के विराम दिवस पर आध्यात्म, भक्ति और भजन की अविरल धारा बहती रही।

इस अवसर पर विधायक गोपाल सिंह इंजीनियर, पूर्व विधायक रघुनाथ सिंह मालवीय, जनपद अध्यक्ष श्रीमती दीक्षा (सोनू) गुणवान, जनपद उपाध्यक्ष गजराज सिंह पटेल सहित हजारों श्रद्धालुओं ने कृष्णा मां की अमृतवाणी का रसपान किया।

इस पावन अवसर पर सैकड़ों भक्तों ने गुरु दीक्षा प्राप्त की, और सभी गुरु भक्तों ने अपने-अपने गुरु की चरण वंदना कर पूजन-अर्चन और आरती की। दिनभर भंडारे का आयोजन चलता रहा, जिसमें श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।गुरु मां कृष्णा जी ने अपने प्रवचन में जीवन के आध्यात्मिक मूल्यों को सरल किंतु गूढ़ शब्दों में समझाया:

✦ मुख्य बिंदु:1. गुरु के बिना जीवन अधूरा:कृष्णा मां ने कहा, “जब तक जीवन में कोई सद्गुरु नहीं होता, तब तक जीवन की सही शुरुआत नहीं होती।” उन्होंने नारद जी की कथा सुनाते हुए बताया कि जब नारद जी भगवान नारायण की सभा से उठकर जाने लगे, तो भगवान ने लक्ष्मी जी से उनकी जगह को गोबर से लीपने को कहा। जब नारद जी ने इसका कारण पूछा, तो भगवान ने कहा कि “तुम्हारे जीवन में कोई गुरु नहीं है।” इसके बाद नारद जी ने एक मछुवारे को अपना गुरु बनाकर ज्ञान प्राप्त किया।

2. गुरुहीनता विनाश का कारण:“जिसके जीवन में गुरु नहीं होता, वह जन्म-जन्मांतर के चक्र में भटकता रहता है।” रावण और दुर्योधन जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए मां ने कहा कि रावण के पास गुरु नहीं था और दुर्योधन ने मामा शकुनि को गुरु बनाया, जिसके कारण उनका अंत निश्चित हुआ।3. भक्त की पुकार और भगवान की कृपा:उन्होंने गजेंद्र-मोक्ष की कथा सुनाई, जिसमें हाथी ने संकट में भगवान को पुकारा और भगवान ने न केवल उसे बचाया, बल्कि मगर का भी उद्धार किया। यह संदेश दिया कि “भक्त की सच्ची पुकार पर प्रभु अवश्य आते हैं।

”4. कर्म का सिद्धांत:मां कृष्णा ने कहा, “कर्म हमेशा लौट कर आता है। इंसान जो भी करता है, उसे किसी न किसी जन्म में उसका फल भोगना पड़ता है। प्रभु न दंड देते हैं, न माफ करते हैं — वह तो केवल कर्म के तराजू में न्याय करते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि “सुख का बटन हमारे ही हाथ में है — हम ही उसे ऑन और ऑफ करते हैं।”इस आध्यात्मिक आयोजन में श्रद्धालुओं ने गुरु महिमा, भक्ति, और कर्म सिद्धांत का गहनता से अनुभव किया। वातावरण पूरी तरह भक्ति, समर्पण और ज्ञान से ओतप्रोत रहा।कार्यक्रम का समापन भक्तों के उत्साह और गुरु कृपा की अनुभूति के साथ हुआ, जिसमें सभी ने अपने जीवन में गुरु के महत्व को नमन करते हुए सच्चे शिष्य बनने का संकल्प लिया।

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